अमलीपदर के लोग बेहाल, पुल निर्माण में सरकार और ठेकेदार की लापरवाही उजागर
अधूरे पुल बनी मुसीबत

भारी बारिश ने तोड़ी कनेक्टिविटी —
अमलीपदर के लोग बेहाल, पुल निर्माण में सरकार और ठेकेदार की लापरवाही उजागर
“अगर विकास नहीं करना है, तो कर दो उड़ीसा में शामिल” — ग्रामीणों की नाराजगी
आमलीपदर:-_यह कहानी सिर्फ एक पुल की नहीं, बल्कि एक सिस्टम की विफलता की है। तीन साल में एक भी खंभा न खड़ा होना, भुगतान हो जाने के बावजूद कार्य अधूरा रहना — यह दर्शाता है कि प्रशासनिक निगरानी कितनी कमजोर है। ग्रामीणों की जिंदगी खतरे में है, लेकिन जिम्मेदार विभाग फाइलों में फंसे पड़े हैं।
अमलीपदर जैसी रणनीतिक और व्यापारिक जगह — जो न केवल गरियाबंद बल्कि उड़ीसा से भी जुड़ती है — वहां अगर विकास कार्य इतने सालों तक अधर में लटक जाएं, तो सवाल उठना लाजमी है कि आखिर जवाबदेही तय कौन करेगा?
सरकार दावा करती है कि गांव-गांव तक सड़क और पुल पहुंचा रही है, लेकिन अमलीपदर के लोग आज भी उसी पुराने रपटे और गड्ढों से होकर गुजरने को मजबूर हैं। अब जब वह रपटा भी बह गया है, तो पूरा क्षेत्र व्यवहारिक रूप से कट गया है।
सेतु निर्माण विभाग के ई.ई. संतोष कुमार पंडोले के अनुसार, अब तक परियोजना का लगभग 27 प्रतिशत भुगतान हो चुका है। पुराने ठेकेदार के हटने के बाद दो बार री-टेंडरिंग की प्रक्रिया हुई, लेकिन कोई भी ठेकेदार आगे नहीं आया। अब तीसरी बार निविदा निकली है, और नए ठेकेदार का बिड ओपन पास हो चुका है। बारिश थमते ही, विभाग का कहना है कि निर्माण कार्य फिर से शुरू होगा।
अमलीपदर की यह कहानी एक चेतावनी है — कि अगर विकास योजनाओं की निगरानी ईमानदारी से नहीं हुई, तो करोड़ों खर्च करने के बावजूद जनता को सिर्फ कीचड़, गड्ढे और टूटे वादे ही मिलेंगे।
फिलहाल अमलीपदर के लोग यही कह रहे हैं —
“हम पुल नहीं, अपनी उम्मीदें बहा बैठे हैं।”
पिछले 13 घंटे से लगातार हो रही मूसलधार बारिश ने गरियाबंद जिले के अमलीपदर क्षेत्र की कनेक्टिविटी पूरी तरह तोड़ दी है। क्षेत्र को जोड़ने वाला एकमात्र रपटा बह जाने से दर्जनों गांवों का संपर्क टूट गया है। ग्रामीणों की आवाजाही ठप है और गुस्सा सरकार व ठेकेदारों पर फूट पड़ा है। सवाल उठ रहा है — आखिर तीन साल से चल रहा पुल निर्माण अधूरा क्यों है?
अमलीपदर को जोड़ने वाली प्रधानमंत्री सड़क — खोखमा से गुमराहपदर मार्ग — पर दो प्रमुख पुल निर्माण अधर में लटके पड़े हैं। सूखने (सुखा तेल) नदी पर 7.30 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाली पुलिया का काम तीन साल में पूरा होना था, लेकिन ठेकेदार एमजी एसोसिएट्स ने एक भी खंभा नहीं खड़ा किया। नतीजा — ठेकेदार को दो साल पहले ब्लैकलिस्ट कर दिया गया।
लेकिन इन सरकारी प्रक्रियाओं के बीच, सबसे ज्यादा भुगत रहा है आम ग्रामीण।
सुखा तेल नदी पर बनने वाला यह पुल अमलीपदर की नवीन तहसील के लगभग 40 से 45 गांवों के लोगों के लिए जीवन रेखा है। यही सड़क उड़ीसा राज्य से भी जुड़ती है। पुल अधूरा रहने से लोगों को अब रायपुर की ओर जाने के लिए 30 से 40 किलोमीटर लंबा चक्कर लगाना पड़ रहा है।
दूसरी ओर, चिकली नदी पर एन.एन. कंस्ट्रक्शन कंपनी का पुल निर्माण भी अधूरा है। मार्च 2025 तक काम पूरा होना था, लेकिन ठेकेदार की रफ्तार बेहद धीमी है। विभाग के दो बिल (मार्च और दिसंबर) अभी भी भुगतान की प्रतीक्षा में हैं।
इस पुल के न बनने से करीब 12 पंचायतों के लोग बुरी तरह प्रभावित हैं। क्षेत्र का प्रमुख साप्ताहिक हाट बाजार चिकली में लगता है, जो अब पूरी तरह ठप है।
भारी बारिश ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। पिछले आठ दिनों से लगातार बरसात से नदी किनारे बसे मोहल्लों में पानी भर गया है। कई मकान ढह चुके हैं और मक्का की फसल पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है।
जोरावर सिंह राजपूत, पूर्व मंडल अध्यक्ष भाजपा कहते है “अगर सरकार का यही मंशा है कि विकास नहीं करना है, तो हम लोग उड़ीसा में ही रहते तो बेहतर होता। नवीन तहसील बनने के बाद भी सरकार ने इस क्षेत्र को अंधेरे में छोड़ दिया है।”




