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15 अगस्त को भी सड़क पर ग्रामीण, 8 साल से विद्यालय भवन की मांग—आखिर कब जागेगा प्रशासन?

15 अगस्त को भी सड़क पर ग्रामीण, 8 साल से विद्यालय भवन की मांग—आखिर कब जागेगा प्रशासन?

प्रधान संपादक खिरसिन्दुर नागेश

गरियाबंद-: देश आज अपनी आजादी का 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। जगह-जगह तिरंगा फहराया जा रहा है, देशभक्ति के गीत गूंज रहे हैं और सरकार शिक्षा एवं विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही है। लेकिन इसी बीच गरियाबंद जिले के रुवार क्षेत्र के ग्रामीण विद्यालय भवन की मांग को लेकर 15 अगस्त के दिन भी धरने पर बैठे हैं। यह तस्वीर व्यवस्था और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

ग्रामीणों का कहना है कि विद्यालय भवन की मांग कोई नई नहीं है। पिछले 8 से 10 वर्षों से लगातार विद्यालय भवन निर्माण की मांग की जा रही है, लेकिन आज तक उनकी मांग पर ठोस पहल नहीं हुई। इसी नाराजगी के चलते ग्रामीणों ने धरना शुरू किया, जिसे अब चार से पांच दिन होने को हैं।

धरने के पहले ही दिन जिले के एसडीएम, तहसीलदार सहित प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे थे, ग्रामीणों से बातचीत भी हुई, लेकिन बातचीत के बावजूद ऐसा कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया, जिससे आंदोलन समाप्त हो सके। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि जब तक उन्हें लिखित और उचित समाधान अथवा स्पष्ट आश्वासन नहीं मिलता, तब तक उनका धरना जारी रहेगा।

15 अगस्त को भी धरना, आखिर यह कैसी आजादी?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस दिन पूरा देश स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, उसी दिन एक गांव के पालक और ग्रामीण अपने बच्चों के लिए एक अदद विद्यालय भवन की मांग को लेकर धरने पर बैठे हैं।

आजादी का अर्थ केवल तिरंगा फहराना और समारोह आयोजित करना नहीं, बल्कि गांव के अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा, स्वास्थ्य और मूलभूत सुविधाएं पहुंचाना भी है। ऐसे में वर्षों से विद्यालय भवन की मांग कर रहे ग्रामीणों का आंदोलन प्रशासन और सरकार के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।

बच्चे स्कूल नहीं जाएंगे तो पढ़ाई का क्या होगा?

ग्रामीणों की चिंता केवल भवन तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि यदि विद्यालय भवन की समस्या का समाधान नहीं होता और पालक मजबूरी में अपने बच्चों को विद्यालय भेजना बंद कर देते हैं, तो इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ेगा।

एक तरफ सरकार बच्चों को बेहतर शिक्षा देने की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ यदि किसी गांव के बच्चों को सुरक्षित और उचित विद्यालय भवन के लिए संघर्ष करना पड़े, तो यह व्यवस्था की गंभीर विडंबना है।

₹22,466 करोड़ के शिक्षा बजट के बीच रुवार का सवाल

छत्तीसगढ़ सरकार ने वर्ष 2026-27 में स्कूल शिक्षा विभाग के लिए ₹22,466 करोड़ का प्रावधान किया है।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतने बड़े शिक्षा बजट में गरियाबंद जिले के रुवार जैसे गांवों के जर्जर अथवा भवन-विहीन विद्यालयों के लिए क्या प्रावधान है? क्या रुवार के विद्यालय भवन को इस बजट अथवा संबंधित निर्माण योजना में शामिल किया गया है? यदि किया गया है तो काम कब शुरू होगा और यदि नहीं किया गया है तो वर्षों से मांग कर रहे ग्रामीणों की मांग आखिर कब पूरी होगी?

यह सवाल किसी राजनीतिक आरोप से अधिक बच्चों के भविष्य और शिक्षा के अधिकार से जुड़ा हुआ है।

आश्वासन नहीं, अब चाहिए ठोस कार्रवाई

ग्रामीणों का कहना है कि वे वर्षों से अधिकारियों के सामने अपनी समस्या रखते आ रहे हैं। आवेदन, मांग और बातचीत के बाद भी जब स्थिति नहीं बदली तो उन्हें आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा।

अब ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन केवल मौके पर पहुंचकर बातचीत तक सीमित न रहे, बल्कि विद्यालय भवन निर्माण की स्वीकृति, बजट और निर्माण की समयसीमा को लेकर स्पष्ट निर्णय सामने रखे।

स्वतंत्रता दिवस पर रुवार से उठ रही यह आवाज दरअसल केवल एक विद्यालय भवन की मांग नहीं, बल्कि यह सवाल है कि आजादी के 80 वर्ष बाद भी क्या गांव के बच्चों को अपने स्कूल के लिए आंदोलन करना पड़ेगा?

अब देखना होगा कि चार-पांच दिनों से धरने पर बैठे ग्रामीणों की आवाज जिला प्रशासन और शासन तक कितनी गंभीरता से पहुंचती है और क्या स्वतंत्रता दिवस के दिन उन्हें सिर्फ आश्वासन मिलता है या उनके बच्चों के भविष्य के लिए कोई ठोस निर्णय भी होता है।

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