देवझर-अमली के 156 परिवार बोले—विस्थापन मंजूर, पहले तय हों पुनर्वास की शर्तें
देवझर-अमली के 156 परिवार बोले—विस्थापन मंजूर, पहले तय हों पुनर्वास की शर्तें
देवझर-अमली के 156 परिवार बोले—विस्थापन मंजूर, पहले तय हों पुनर्वास की शर्तें

50 साल से अधिक समय से रह रहे ग्रामीणों ने वन विभाग को सौंपा पत्र, ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित होने के बाद ही विस्थापन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की मांग
मैनपुर । उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व क्षेत्र के देवझर-अमली गांव के ग्रामीणों ने विस्थापन को लेकर अपनी सहमति जताई है, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया है कि पहले पुनर्वास की शर्तें ग्राम सभा में तय हों और उन्हें प्रस्ताव में दर्ज किया जाए। करीब 156 परिवारों और 550 से अधिक आबादी वाले इस गांव के ग्रामीणों ने ग्राम सभा में सर्वसम्मति से विस्थापन के लिए सहमति जताते हुए वन विभाग को आवेदन सौंपा है।
ग्रामीणों का कहना है कि वे पिछले 50 वर्षों से अधिक समय से यहां निवास कर रहे हैं। गांव वर्ष 1945 में बसाया गया था और वर्तमान में यह ग्राम पंचायत आमाड़ का आश्रित ग्राम है। शासन द्वारा इसे राजस्व ग्राम भी घोषित किया जा चुका है। ग्रामीणों का कहना है कि वे अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़ने को तैयार हैं, लेकिन विस्थापन सम्मानजनक और शासन की पुनर्वास नीति के अनुरूप होना चाहिए।
पहले ग्राम सभा में तय होंगी शर्तें
ग्रामीणों ने मांग की है कि विस्थापन की प्रक्रिया शुरू करने से पहले ग्राम सभा आयोजित कर सभी परिवारों की सहमति और मांगों का प्रस्ताव पारित किया जाए। पुनर्वास स्थल पर सड़क, पुल-पुलिया, बिजली, पेयजल, स्कूल, आंगनबाड़ी सहित अन्य जरूरी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की शर्त पहले ही स्पष्ट की जाए। ग्रामीणों का कहना है कि केवल गांव खाली कराकर दूसरी जगह बसाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि नए स्थान पर जीवन-यापन के लिए जरूरी सुविधाएं भी मिलनी चाहिए।
15 लाख रुपए या आवास के साथ 5 एकड़ जमीन का विकल्प
ग्रामीणों के अनुसार उन्हें बताया गया है कि स्वेच्छा से विस्थापन करने पर पुनर्वास नीति के तहत पात्र परिवारों के लिए दो विकल्प हो सकते हैं। पहले विकल्प में 15 लाख रुपए और दूसरे विकल्प में आवास के साथ 5 एकड़ कृषि भूमि दिए जाने की बात कही गई है। ग्रामीण चाहते हैं कि पुनर्वास पैकेज, पात्रता और सभी अधिकारों को ग्राम सभा के प्रस्ताव में स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाए, ताकि भविष्य में किसी तरह का विवाद या असमंजस न हो।
18 वर्ष की उम्र पर अलग यूनिट की मांग
ग्रामीणों ने मांग रखी है कि परिवार में 18 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुके युवक-युवती को भी अलग यूनिट मानते हुए पुनर्वास का लाभ दिया जाए। इसके तहत 5 एकड़ कृषि भूमि और 15 लाख रुपए की पात्रता देने की मांग की गई है। इसी तरह विधवा, परित्यक्ता, दिव्यांग और अनाथ को भी पात्रता के अनुसार अलग यूनिट मानने की मांग उठी है।
ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यदि किसी परिवार के पास पहले से राजस्व भूमि है और पुनर्वास नीति में एक यूनिट के लिए 5 एकड़ जमीन का प्रावधान है, तो पात्र अतिरिक्त यूनिट के लिए अतिरिक्त 5 एकड़ जमीन उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
दादा-पिता के समय से सुनते आ रहे विस्थापन की चर्चा
ग्रामीण पुस्तम सिंह मांझी ने बताया कि विस्थापन की चर्चा वे अपने दादा और पिता के समय से सुनते आ रहे हैं। पहले भी संभावित पुनर्वास और खेत-खार को लेकर प्रक्रिया आगे बढ़ी थी, लेकिन बाद में मामला रुक गया। अब ग्रामीण स्वेच्छा से विस्थापन के लिए तैयार हैं, लेकिन चाहते हैं कि शासन की पुनर्वास नीति के तहत मिलने वाले सभी अधिकार और सुविधाएं पहले स्पष्ट हों।
17 गांवों को लेकर हुई बैठकों के बाद पहला गांव तैयार
उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व क्षेत्र में विस्थापन को लेकर करीब 17 गांवों में बैठकों का दौर चल चुका है। इनमें मोतीपानी, कोदोमाली, नागेश, कोयबा, रक्षापथरा, सोयाबीन, बम्हनी, झोला, भूतबेड़ा, करलाझर, जांगड़ा, पहलीखंड, बरगांव, डूमरपड़ाव, अमली-जुगाड़, आमाड़ और देवझर-अमली सहित अन्य गांव शामिल बताए गए हैं। इन बैठकों के बाद देवझर-अमली के ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से स्वेच्छा से विस्थापन के लिए सहमति जताई है।
निगरानी समिति में ग्राम सभा की भूमिका की मांग
ग्रामीणों ने विस्थापन प्रक्रिया के दौरान निगरानी समिति में ग्राम सभा के प्रतिनिधियों को शामिल करने की भी मांग की है। उनका कहना है कि पुनर्वास स्थल पर मकान निर्माण और अन्य विकास कार्यों की निगरानी में ग्राम सभा की भूमिका होनी चाहिए, ताकि निर्माण कार्यों में किसी प्रकार की अनियमितता या भ्रष्टाचार की गुंजाइश न रहे।
ग्राम सभा के प्रस्ताव के बाद आगे बढ़े प्रक्रिया
देवझर-अमली के ग्रामीणों का कहना है कि वे शासन और वन विभाग के साथ सहयोग करने के लिए तैयार हैं। उनकी मांग केवल इतनी है कि विस्थापन से पहले पुनर्वास की सभी शर्तें ग्राम सभा में स्पष्ट हों, प्रत्येक परिवार की पात्रता तय हो और मूलभूत सुविधाओं की लिखित गारंटी दी जाए। इसके बाद ही वन विभाग और प्रशासन द्वारा पुनर्वास की कार्ययोजना तैयार कर विस्थापन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए।


