गरियाबंद से ओडिशा तक 200 किमी पीछा, सरकारी इमारत में छिपा मिला 7 किलो का जिंदा पैंगोलिन
गरियाबंद से ओडिशा तक 200 किमी पीछा, सरकारी इमारत में छिपा मिला 7 किलो का जिंदा पैंगोलिन

गरियाबंद से ओडिशा तक 200 किमी पीछा, सरकारी इमारत में छिपा मिला 7 किलो का जिंदा पैंगोलिन
गरियाबंद/नुआपाड़ा। जंगल में रहने वाला शांत और शर्मीला पैंगोलिन अब वन्यजीव तस्करों के लिए कमाई का जरिया बनता जा रहा है। गरियाबंद में एक जिंदा पैंगोलिन के सौदे के लिए ग्राहक तलाशे जाने की सूचना मिलने के बाद वन विभाग की एंटी-पोचिंग टीम ने निगरानी शुरू की। इसके बाद सामने आई तस्वीर ने जांच का दायरा छत्तीसगढ़ से निकालकर ओडिशा तक पहुंचा दिया।
तस्करों की गतिविधियों पर नजर रखते हुए टीम करीब 200 किलोमीटर तक उनके पीछे गई। गरियाबंद से देवभोग, कालाहांडी होते हुए मामला ओडिशा के नुआपाड़ा जिले के पालमा तक पहुंचा। यहां एक सरकारी इंटेकवेल की इमारत में जिंदा पैंगोलिन को छिपाकर रखा गया था।
इमारत के भीतर छिपा था जंगल का ‘गोल कवच’
रात करीब 9 बजे संयुक्त टीम ने पालमा में दबिश दी। तलाशी के दौरान करीब 7 किलो वजन का जीवित पैंगोलिन बरामद हुआ। टीम के सामने आते ही पैंगोलिन ने खतरा भांपकर खुद को समेट लिया और गेंद की तरह गोल हो गया। वन विभाग की टीम ने उसे सुरक्षित अपने कब्जे में ले लिया।
कार्रवाई के दौरान आरोपियों और बिचौलियों को गिरफ्तार किया गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार कार्रवाई में पालमा के बालकृष्ण हाटी और सोनू हाटी के साथ गरियाबंद के देवभोग क्षेत्र का रोशन ठाकुर भी शामिल है।
ग्राहक कौन था? जांच का सबसे बड़ा सवाल
इस पूरे मामले में जांच एजेंसियों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल सिर्फ पैंगोलिन के शिकार का नहीं, बल्कि उसके खरीदार और आगे के नेटवर्क का है।
पूछताछ में यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि पैंगोलिन को जंगल से किसने पकड़ा, उसे पालमा तक कौन लेकर आया और उसके लिए ग्राहक कौन था। जांच का फोकस उस नेटवर्क तक पहुंचने पर है, जो जंगली जीवों को पकड़कर दूसरे राज्यों तक पहुंचाने और फिर संभावित खरीदारों से सौदा करने में सक्रिय हो सकता है।
मामले की कड़ियां छत्तीसगढ़ से ओडिशा तक जुड़ने के कारण वन विभाग इसे केवल एक स्थानीय शिकार का मामला मानकर नहीं चल रहा है। तस्करी की पूरी श्रृंखला और संभावित खरीदारों की भूमिका भी जांच के दायरे में है।
शल्क बना सबसे बड़ा लालच
पैंगोलिन के शरीर पर मौजूद शल्क उसकी तस्करी की बड़ी वजह माने जाते हैं। इन शल्कों को लेकर चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में पारंपरिक चिकित्सा से जुड़े कई दावे प्रचलित हैं। हालांकि इनके औषधीय फायदे से जुड़े कई दावों को वैज्ञानिक आधार नहीं मिला है।
दूसरी ओर, भारत में भी जीवित पैंगोलिन को कथित तांत्रिक अनुष्ठानों से जोड़कर अवैध कारोबार किए जाने की जानकारी सामने आती रही है। यही अंधविश्वास और अंतरराष्ट्रीय मांग मिलकर इस वन्यजीव को तस्करों के निशाने पर ला रहे हैं।
शांत और शर्मीला जीव, लेकिन तस्करों के लिए बड़ा कारोबार
पैंगोलिन सामान्य तौर पर शांत स्वभाव का वन्यजीव है। खतरा महसूस होने पर यह अपने शरीर को पूरी तरह समेटकर गेंद जैसी आकृति बना लेता है। शरीर पर मौजूद मजबूत शल्क इसे शिकारियों से बचाने में मदद करते हैं।
विडंबना यह है कि यही शल्क अब उसके लिए सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं। अवैध बाजार में मांग के कारण शिकारी जंगलों में इसकी तलाश करते हैं और पकड़ने के बाद इसे बिचौलियों के जरिए संभावित खरीदारों तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं।
पालमा में हुई कार्रवाई इस बात का उदाहरण है कि वन्यजीव तस्करी का नेटवर्क एक राज्य तक सीमित नहीं रह गया है। सूचना मिलने के बाद वन विभाग की टीम ने लगातार निगरानी करते हुए तस्करों की गतिविधियों का पीछा किया और दूसरे राज्य में जाकर पैंगोलिन को सुरक्षित बरामद किया।
अब आगे की जांच में खुल सकते हैं कई राज
वन विभाग की कार्रवाई से एक जिंदा पैंगोलिन को तो बचा लिया गया, लेकिन जांच का असली लक्ष्य उस नेटवर्क तक पहुंचना है जो जंगल से वन्यजीवों को पकड़ने से लेकर उसके खरीदार तक पहुंचाने का काम करता है।
जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि पैंगोलिन जंगल से कहां पकड़ा गया था, उसे किसके निर्देश पर रखा गया और उसके लिए ग्राहक कौन था। यदि इस नेटवर्क की अगली कड़ियां सामने आती हैं तो वन्यजीव तस्करी के बड़े नेटवर्क का खुलासा हो सकता है।
वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से यह कार्रवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एक दुर्लभ वन्यजीव को तस्करों के हाथों में जाने से पहले सुरक्षित बचा लिया गया। अब निगाहें इस बात पर हैं कि पूछताछ और जांच में पैंगोलिन के संभावित खरीदार और तस्करी नेटवर्क से जुड़े और कितने नाम सामने आते हैं।
तस्वीरों में उपलब्ध मूल समाचार का संक्षिप्त पाठ
गरियाबंद जंगल में रहने वाला शांत और शर्मीला पैंगोलिन अब वन्यजीव तस्करों के लिए कमाई का जरिया बन गया है। गरियाबंद में एक जिंदा पैंगोलिन के सौदे के लिए ग्राहक तलाशे जाने की सूचना मिली तो वन विभाग की एंटी-पोचिंग टीम ने निगरानी शुरू की। इसके बाद जो तस्वीर सामने आई, उसने जांच का दायरा छत्तीसगढ़ से निकालकर ओडिशा तक पहुंचा दिया। तस्करों की गतिविधियों पर नजर रखते हुए टीम करीब 200 किलोमीटर तक उनके पीछे गई। गरियाबंद से देवभोग, कालाहांडी होते हुए मामला ओडिशा के नुआपाड़ा जिले के पालमा तक पहुंचा। यहां एक सरकारी इंटेकवेल की इमारत में पैंगोलिन को छिपाकर रखा गया था।
रात करीब 9 बजे संयुक्त टीम ने पालमा में दबिश दी। तलाशी के दौरान लगभग 7 किलो वजन का जीवित पैंगोलिन बरामद हुआ। टीम के सामने आते ही उसने खतरा भांपकर खुद को समेट लिया और गेंद की तरह गोल हो गया। वन विभाग ने उसे सुरक्षित अपने कब्जे में लिया। कार्रवाई के दौरान पांच आरोपियों और बिचौलियों को गिरफ्तार किए जाने का उल्लेख है। इनमें पालमा के बालकृष्ण हाटी और सोनू हाटी के साथ गरियाबंद के देवभोग क्षेत्र का रोशन ठाकुर भी शामिल है।
जांच एजेंसियों के सामने अब सबसे बड़ा सवाल सिर्फ पैंगोलिन के शिकार का नहीं, बल्कि उसके खरीदार और आगे के नेटवर्क का है। पूछताछ में यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि पैंगोलिन जंगल से किसने पकड़ा, उसे पालमा तक कौन लेकर आया और आगे उसका सौदा किसके साथ होना था।
पैंगोलिन के शरीर पर मौजूद शल्क इसकी तस्करी की बड़ी वजह माने जाते हैं। इन शल्कों को लेकर चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों में पारंपरिक चिकित्सा से जुड़े कई दावे प्रचलित हैं। हालांकि इनके औषधीय फायदे के कई दावों को वैज्ञानिक आधार नहीं मिला है। दूसरी ओर भारत में जीवित पैंगोलिन को कथित तांत्रिक अनुष्ठानों से जोड़कर भी अवैध कारोबार किए जाने की जानकारी सामने आती रही है। यही अंधविश्वास और अंतरराष्ट्रीय मांग मिलकर इस छोटे से वन्यजीव को तस्करों के निशाने पर ला रहे हैं।




