मैनपुर में हाथियों का आतंक, 10 एकड़ धान की फसल रौंदी; किसानों ने मुआवजा बढ़ाने की उठाई मांग
मैनपुर में हाथियों का आतंक, 10 एकड़ धान की फसल रौंदी; किसानों ने मुआवजा बढ़ाने की उठाई मांग

मैनपुर। विकासखंड के वनांचल क्षेत्रों में जंगली हाथियों का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। हाथियों के झुंड आए दिन खेतों में घुसकर किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। ताजा मामला ग्राम पंचायत जिडार के आश्रित ग्राम गिरहोला (रामपारा) का है, जहां बीती रात 20 से 25 हाथियों के एक बड़े दल ने खेतों में जमकर उत्पात मचाया। हाथियों ने लगभग 10 एकड़ में खड़ी धान की फसल को रौंदकर बर्बाद कर दिया।
सुबह जब किसान अपने खेतों में पहुंचे तो फसल की स्थिति देखकर उनके चेहरे पर मायूसी छा गई। प्रभावित किसानों में धरम सिंह, पुनीत राम, दीनदयाल, प्रेमसाय मरकाम, चरण सिंह नेताम और फुंकू राम शामिल हैं। ग्रामीणों के अनुसार हाथियों का दल रातभर क्षेत्र में घूमता रहा और कई खेतों को नुकसान पहुंचाया।
रातभर की मेहनत पर फिरा पानी
धान की फसल किसानों के लिए पूरे साल की आमदनी का प्रमुख स्रोत होती है। किसानों का कहना है कि फसल तैयार करने में महीनों की मेहनत और हजारों रुपये का निवेश लगता है। हाथियों के एक रात के हमले ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
ग्रामीणों के मुताबिक हाथियों की मौजूदगी के कारण लोग रात में खेतों की रखवाली करने से भी डरते हैं। कई गांवों में हाथियों की आवाजाही लगातार बनी हुई है, जिससे ग्रामीणों में दहशत का माहौल है।
लागत और मुआवजे के बीच बड़ा अंतर
प्रभावित किसानों का कहना है कि प्रति एकड़ धान उत्पादन में जुताई, बीज, खाद, उर्वरक और मजदूरी सहित 10 हजार रुपये से अधिक की लागत आती है। वहीं फसल सुरक्षित रहने पर शासकीय धान खरीदी केंद्र में बिक्री से प्रति एकड़ लगभग 31 हजार रुपये तक की आय प्राप्त होती है।
किसानों का आरोप है कि फसल पूरी तरह नष्ट होने के बावजूद वन विभाग से मिलने वाला मुआवजा करीब 9 हजार रुपये प्रति एकड़ ही है। उनका कहना है कि यह राशि वास्तविक नुकसान की तुलना में काफी कम है और इससे खेती में लगी लागत की भी पूरी भरपाई नहीं हो पाती है।
छत्तीसगढ़ में मानव-हाथी संघर्ष और फसल नुकसान को लेकर पहले भी मुआवजा बढ़ाने की मांग उठती रही है। कई किसान संगठनों और विशेषज्ञों ने मौजूदा मुआवजा व्यवस्था की…



