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योग दिवस पर अनोखी प्रस्तुति: झरगांव प्राथमिक शाला के शिक्षक मदनलाल नेताम ने कराया "सूत्र नेति" योग का प्रदर्शन

योग दिवस पर अनोखी प्रस्तुति: झरगांव प्राथमिक शाला के शिक्षक मदनलाल नेताम ने कराया "सूत्र नेति" योग का प्रदर्शन

प्रधान संपादक खिरसिन्दुर नागेश

योग दिवस पर अनोखी प्रस्तुति: झरगांव प्राथमिक शाला के शिक्षक मदनलाल नेताम ने कराया “सूत्र नेति” योग का प्रदर्शन

 

 

 

 

गरियाबंद अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर जहां देशभर में योग के प्रति उत्साह दिखाई दिया, वहीं झारगांव प्राथमिक शाला के शिक्षक मदनलाल नेताम ने एक अनोखी और पारंपरिक योग विधि “सूत्र नेति” योग का प्रदर्शन कर सबका ध्यान आकर्षित किया। यह प्राचीन योगिक शुद्धि क्रिया आज बहुत कम लोग जानते हैं या कर पाते हैं, लेकिन मदनलाल नेताम न केवल इसे स्वयं करते हैं, बल्कि अपने विद्यालय के बच्चों को भी इसे सिखा रहे हैं।

 

 

 

 

“सूत्र नेति” एक ऐसी योगिक तकनीक है जिसमें सूती धागे या रबर की पतली नली को नाक में डालकर मुंह से निकाला जाता है। इससे नाक, गला और श्वसन मार्ग की सफाई होती है, जिससे साइनस, एलर्जी और अन्य श्वास संबंधी समस्याओं से राहत मिलती है। यह तकनीक योग शास्त्रों में वर्णित है, परन्तु बहुत कम लोग इसे अभ्यास में ला पाते हैं।

 

 

 

 

 

आज 21 जून को पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मना रही थी, जगह-जगह बड़े आयोजन, स्टेज, सेलिब्रिटी उपस्थिति और प्रचार प्रसार हो रहे थे। इसी बीच एक साधारण ग्रामीण शिक्षक ने अपने विद्यालय के प्रांगण में बच्चों के साथ योग करते हुए यह सिद्ध कर दिया कि योग का असली उद्देश्य है—स्वस्थ जीवन की ओर कदम बढ़ाना।

 

मदनलाल नेताम ने बच्चों को न केवल सामान्य योगासन सिखाए, बल्कि सूत्र नेति जैसी दुर्लभ विधि का अभ्यास कर उनके अंदर स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता भी बढ़ाई। बच्चों और ग्रामीणों ने भी इस योग को देखकर प्रेरणा ली और कई लोगों ने इसे सीखने की उत्सुकता भी दिखाई।

 

यह अनोखी विधि और शिक्षक का समर्पण सोशल मीडिया पर भी वायरल हो गया है। लोग उनकी सराहना कर रहे हैं और ऐसे प्रयासों को गांव-गांव तक फैलाने की मांग कर रहे हैं। शिक्षक नेताम ने बताया, “हमारे पूर्वजों ने जो योग पद्धति बनाई थी, वह केवल शरीर को लचीला करने के लिए नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि और मानसिक शांति के लिए थी। मैं चाहता हूँ कि बच्चे शुरू से ही इस समझ के साथ योग करें।”

 

 

 

 

 

इस तरह का जमीनी स्तर का योगदान निश्चित ही योग दिवस को और अधिक सार्थक बनाता है, और यह संदेश देता है कि असली योग बड़े मंचों पर नहीं, बल्कि छोटे-छोटे गांवों के स्कूलों में जीवित है।

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